अब निगाहें ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि आखिर कब तक किसान को उसका वैधानिक अधिकार और आवंटित प्लॉट का कब्जा मिल पाता है।
ग्रेटर नोएडा/ फेस वार्ता: ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। तुगलपुर गांव के निवासी किसान देवदत्त शर्मा का आरोप है कि वर्ष 2017 में आवंटित प्लॉट का कब्जा उन्हें आज तक नहीं मिल सका है। कई प्रशासनिक प्रयासों, न्यायालयी आदेशों और शिकायतों के बावजूद मामला लंबित बना हुआ है।देवदत्त शर्मा के अनुसार, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने वर्ष 2017 में कासना क्षेत्र में 170 वर्ग मीटर का आवासीय प्लॉट उनके नाम आवंटित किया था। उन्होंने निर्धारित विकास शुल्क भी जमा कर दिया, लेकिन इसके बावजूद उन्हें प्लॉट का भौतिक कब्जा नहीं दिया गया।
किसान का कहना है कि लंबे समय तक समाधान न मिलने पर उन्होंने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्राधिकरण को प्लॉट का कब्जा दिलाने के निर्देश दिए थे।
इसके बाद ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) रवि कुमार एन. जी. द्वारा भी संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए, लेकिन किसान का आरोप है कि जमीनी स्तर पर अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है।
मुख्यमंत्री पोर्टल पर भी की शिकायत
देवदत्त शर्मा ने मुख्यमंत्री जनसुनवाई पोर्टल पर भी कई बार शिकायत दर्ज कराई। पोर्टल पर प्राधिकरण की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया कि संबंधित भूमि पर अवैध कब्जा होने के कारण कब्जा दिलाने में कठिनाई आ रही है तथा अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस बल की मांग की गई है।
प्राधिकरण के अनुसार, जिस भूमि पर प्लॉट आवंटित है, वहां अवैध कब्जा होने के कारण आवंटी को कब्जा नहीं दिया जा सका है। प्रशासनिक स्तर पर अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया जारी बताई गई है, हालांकि अभी तक अंतिम कार्रवाई नहीं हो सकी है।
देवदत्त शर्मा ने प्राधिकरण के कुछ अधिकारियों पर लापरवाही और जानबूझकर मामले को लंबित रखने के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि उन्हें कासना के बजाय अन्य स्थान पर प्लॉट लेने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, जबकि वे अपने मूल आवंटन के अनुसार कासना में ही प्लॉट चाहते हैं।
किसान का कहना है कि यदि कासना में प्लॉट उपलब्ध नहीं कराया जा सकता, तो उन्हें उनके गांव तुगलपुर में वैकल्पिक प्लॉट दिया जाए।
किसान ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो वे लखनऊ पहुंचकर मुख्यमंत्री के जनता दरबार में अपनी शिकायत रखेंगे और पूरे मामले को सार्वजनिक रूप से उठाएंगे।
जिम्मेदारी किसकी?
यह मामला केवल एक आवंटी किसान की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। सवाल यह है कि यदि भूमि पर पहले से अतिक्रमण था तो उसका निस्तारण किए बिना प्लॉट आवंटन कैसे किया गया? वहीं, न्यायालय और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के बाद भी समाधान न निकलना व्यवस्था की कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
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