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कम उम्र में बढ़ रही हैं स्पाइन की समस्याएं, गलत पोश्चर और लंबे समय तक स्क्रीन इस्तेमाल करना प्रमुख कारण

नोएडा, फेस वार्ता: आजकल स्पाइन यानी रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं केवल बढ़ती उम्र के लोगों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि युवा भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं। लंबे समय तक मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल, गलत पोश्चर, शारीरिक गतिविधि की कमी और बढ़ता वजन गर्दन और कमर दर्द की समस्या को बढ़ा रहे हैं। समय पर ध्यान न देने पर स्लिप डिस्क, सर्वाइकल स्पॉन्डाइलोसिस, लंबर स्पॉन्डाइलोसिस और साइटिका जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं। यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के न्यूरोसर्जरी विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकतर मरीजों को दवाओं, फिजियोथेरेपी और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिल सकती है, लेकिन कुछ गंभीर मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ती है।
डॉ. राहुल शर्मा, सीनियर कंसल्टेंट – न्यूरोसर्जरी, यथार्थ हॉस्पिटल, ओमेगा-1, ग्रेटर नोएडा ने कहा, “आजकल 20 से 35 साल के युवाओं में भी कमर और गर्दन दर्द की समस्या बढ़ रही है। हमारी ओपीडी में रोजाना आने वाले मरीजों में लगभग 50–60% रीढ़ और स्पाइन से जुड़ी समस्याओं से परेशान होते हैं। इनमें 20–30% मरीजों में स्लिप डिस्क, जबकि 60–70% में सर्वाइकल या लंबर स्पॉन्डाइलोसिस की समस्या देखी जाती है। लंबे समय तक मोबाइल इस्तेमाल करना, गलत पोस्चर, मोटापा और शारीरिक गतिविधि की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। एक *54 वर्षीय महिला, जिनका वजन लगभग 128 किलो था,L5-S1 स्लिप डिस्क और सियाटिका से परेशान* थीं। एंडोस्कोपिक सर्जरी से नसों पर दबाव हटाने के बाद उन्हें दर्द में राहत मिली और दो सप्ताह में वह स्वतंत्र रूप से चलने लगीं। हमारी ओपीडी के लगभग 80% मरीजों को दवाओं, फिजियोथेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव से आराम मिलता है। युवाओं को नियमित एक्सरसाइज, सही पोस्चर और समय-समय पर ब्रेक लेने पर ध्यान देना चाहिए। लगातार दर्द, सुन्नपन या पैरों में झनझनाहट होने पर डॉक्टर से सलाह लें।“
डॉ. अंकित अग्रवाल, कंसल्टेंट – न्यूरोसर्जन, यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नोएडा एक्सटेंशन ने कहा,* “आजकल कम उम्र में स्पाइन की समस्याओं का प्रमुख कारण बदलती जीवनशैली है। वर्क फ्रॉम होम, लंबे समय तक मोबाइल-लैपटॉप का इस्तेमाल, गलत पोश्चर, व्यायाम की कमी, अनियमित खानपान और बढ़ता वजन इसके प्रमुख कारक हैं। मेरी *ओपीडी में लगभग 70–80% मरीज स्पाइन संबंधी* समस्याओं के आते हैं। *52–80 वर्ष की उम्र में लंबर स्पॉन्डिलोसिस और लंबर कैनाल स्टेनोसिस, जबकि 20–25 वर्ष के युवाओं में भी सर्वाइकल स्पॉन्डिलोसिस और स्लिप डिस्क* देखने को मिल रही है। मसल स्पैज़्म का दर्द अक्सर सीमित रहता है, जबकि साइटिका में दर्द कमर या हिप से पैर और पंजे तक जा सकता है। लंबर कैनाल स्टेनोसिस में चलने पर दर्द, सुन्नपन और कमजोरी हो सकती है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद, विशेषकर *45–50 वर्ष की उम्र के बाद, ऑस्टियोपोरोसिस और फ्रैक्चर का जोखिम बढ़ता है*। लंबे समय तक पेनकिलर लेने से साइड इफेक्ट्स और सही निदान में देरी हो सकती है। लगातार दर्द, सुन्नपन या कमजोरी होने पर चिकित्सकीय जाँच और जरूरत के अनुसार एक्स-रे या एमआरआई जरूरी है। अधिकतर मरीजों को दवाओं, फिजियोथेरेपी, व्यायाम और सही पोश्चर से लाभ मिलता है, लेकिन गंभीर स्टेनोसिस या स्लिप डिस्क में सर्जरी की जरूरत हो सकती है।
मेरे अनुभव में, उचित मरीजों की एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी में लगभग 9 मिमी का चीरा लगाया जाता है और लगभग 90–95% मरीजों* में दर्द तथा चलने-फिरने की क्षमता में सुधार देखा गया है। परिणाम बीमारी और रिकवरी पर निर्भर करते हैं। सर्जरी के बाद फिजियोथेरेपी भी महत्वपूर्ण है। स्पाइन को स्वस्थ रखने के लिए सही पोश्चर, सीमित स्क्रीन टाइम, नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण और लंबे समय तक लगातार बैठने से बचना जरूरी है। कैल्शियम और विटामिन D की कमी होने पर डॉक्टर की सलाह से जाँच और सप्लीमेंट लेने चाहिए। गर्दन, कमर या साइटिका के दर्द को नजरअंदाज न करें; समय पर जाँच और उचित इलाज से गंभीर समस्याओं का जोखिम कम किया जा सकता है।”
डॉ. अरुण शर्मा, सीनियर कंसल्टेंट एवं एचओडी – न्यूरोसर्जरी, यथार्थ हॉस्पिटल, नोएडा 110 के अनुसार,* गलत पोश्चर, लंबे समय तक मोबाइल-लैपटॉप का इस्तेमाल, शारीरिक गतिविधि की कमी और बढ़ता वजन स्पाइन संबंधी समस्याओं के प्रमुख कारण हैं। अस्पताल में प्रतिदिन 40–50 वर्ष की उम्र के लगभग 5 मरीज गर्दन, कमर और रीढ़ की समस्याओं के साथ पहुंचते हैं। हाल ही में 50 वर्षीय एक महिला की जटिल स्पाइन सर्जरी की गई। उनकी रीढ़ में कई स्तरों पर डिस्क की समस्या, दो जगह जोड़ों में अस्थिरता और टेढ़ापन था। उनकी हालत ऐसी थी कि 5–6 मीटर चलना भी मुश्किल था। सर्जरी के दौरान रीढ़ को सीधा किया गया और नसों पर पड़ रहे दबाव को दूर किया गया। पुनर्वास के बाद महज 15 दिनों में उन्होंने सीढ़ियां चढ़ना शुरू कर दिया। अब वह स्वतंत्र रूप से दैनिक कार्य करने के साथ पार्क में भी टहलती हैं।
डॉ. शर्मा ने बताया कि अधिकांश स्पाइन समस्याओं में दवाओं, फिजियोथेरेपी, व्यायाम और जीवनशैली में बदलाव से राहत मिल सकती है। हालांकि, नसों पर गंभीर दबाव या अन्य उपचारों से पर्याप्त लाभ न मिलने पर सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने लोगों को नियमित व्यायाम करने, सही पोश्चर अपनाने, लंबे समय तक लगातार बैठने से बचने और दर्द, सुन्नपन या कमजोरी जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करने की सलाह दी।
विशेषज्ञों का कहना है कि स्पाइन को स्वस्थ रखने के लिए रोजमर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करना जरूरी है। काम के दौरान बीच-बीच में ब्रेक लेना, मोबाइल और लैपटॉप इस्तेमाल करते समय गर्दन को ज्यादा झुकाने से बचना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना और वजन नियंत्रित रखना रीढ़ पर पड़ने वाले अनावश्यक दबाव को कम करने में मदद कर सकता है। यदि गर्दन या कमर में लगातार दर्द हो, दर्द पैरों तक फैलने लगे या सुन्नपन और कमजोरी महसूस हो, तो खुद से पेनकिलर लेने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। समय पर जाँच और सही उपचार से मरीजों को राहत मिलने और उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों में सुधार होने की संभावना बढ़ सकती है।

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