गौतमबुद्धनगर/ फेस वार्ता:जिला कृषि रक्षा अधिकारी, गौतमबुद्धनगर विवेक दूबे ने जनपद के समस्त कृषकों को बताया कि जनपद की रबी फसलों में मुख्य रूप से गेहूं, रबी मक्का, गन्ना, सरसों, चना, मटर एवं आलू प्रमुख फसलें हैं। वर्तमान में प्रदेश के विभिन्न जनपदों में तापमान में हो रहे उतार चढाव के कारण फसलों में सामयिक कीट एवं रोगों के प्रकोप की संभावना बनी हुई है। उक्त परिस्थितियों के दृष्टिगत फसलों को होने वाले नुकसान से बचाव एवं प्रभावी प्रबंधन हेतु फसलवार सुझाव एवं संस्तुतियां जारी की गई हैं, जिनके माध्यम से कृषक अपनी फसलों का संरक्षण कर सकते हैं।
धान्य फसलेंः-
गेहॅू: गेहूॅ में खरपतवार नियंत्रण हेतु 20-25 दिन पर खुरपी या कृदाल से निराई-गुड़ाई कर दें। गेंहुसा एवं जंगली जई के रासायनिक नियंत्रण हेतु सल्फोसल्फ्युरान 75 प्रतिशत, डब्लू0जी0 की 33 ग्राम मात्रा प्रति हे0 350-400 ली0 पानी में घोलकर बुवाई के 20-25 दिन के बाद छिडकाव करें। चौडी पत्ती वाले खरपतवारों के नियंत्रण हेतु मेटसल्फ्युरान मिथाइल 20 प्रति0 20 ग्राम मात्रा/हे0 500 ली0 पानी में घोलकर बुवाई के 20-25 दिन के बाद छिडकाव करना चाहिए।
दीमक/गुजिया-ब्युवेरिया बेसियाना 1.15% की 2.5 किग्रा0 प्रति है0 की दर से 60-70 किग्रा0 गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन छाया में रखने के पश्चात बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय खेत में मिला देने से दीमक सहित अन्य भूमि जनित कीटों का नियंत्रण हो जाता है। खडी फसल में दीमक/गुजिया के नियंत्रण हेतु क्लोरपाईरीफास 20% ई0सी0 2.5 ली0 मात्रा प्रति हे0 की दर से सिचाई के पानी के साथ प्रयोग करें। माहू का प्रकोप दिखने पर क्युनालफास 25 प्रति0 ई0सी0 1 लीटर मात्रा को लगभग 700 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव कर देने से कीट का प्रभावी छिडकाव नियंत्रण किया जा सकता है। जैविक नियंत्रण हेतु माहू के प्राकृतिक शत्रु कीट क्राईसोपर्ला कार्निया का फसल वातावरण में संरक्षण करना चाहिए।काली एवं भूरी गेरूई रोग के नियंत्रण हेतु मैकोजेब 75 प्रति0 अथवा जिनेब 75 प्रति0 की 2 किग्रा मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।
पीली गेरूई रोग के प्रकोप की दशा में प्रोपिकोनाजोल 25 प्रति0 ई0सी0 की 500 मिली मात्रा को 600-700 लीटर पानी में घोलकर छिडकाव करें।
तिलहन:
राई/सरसों- बथुआ, कृष्णनील, हिरनखुरी, जंगली चौलाई आदि के नियंत्रण हेतु पेंडीमेथलीन 38.7 प्रति0 सी0एस0 875 मिली/हे0 की दर से बंवाई के 2-3 दिन के अनदर प्रयोग करें। माहू का प्रकोप होने पर ऑक्सीडिमेटान मिथाइल 25 प्रति0 ई0सी0 ली0 मात्रा अथवा इमिडाक्लोप्रिड़ 17.8 एस0एल0 की 250 मिली मात्रा को 600-700 ली0 पानी में घोलकर छिडकाव करना चाहिए। माहू के नियंत्रण हेतु येलो स्टिकी ट्रैप को खेत में लगा देने से इसका प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। आरा मक्खी के नियंत्रण हेतु क्युनालफास 25 प्रति0 ई0सी0 की 1.2 ली0 मात्रा को लगभग 700 ली0 पानी में घोलकर छिडकाव कर देने से कीट का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है। आरा मक्खी-डाईमिथोएट 30% ई0सी0 650 मिली0/हे0 अथवा क्यूनालफास 25% ई0सी0 की 1.2 ली0 मात्रा/हे0 की से 700 ली0 पानी में घोलकर करें।
आल्टरनेरिया पत्ती धब्बा के नियंत्रण हेतु इप्रोडियान 50 प्रति0 डब्लू पी0 की 2.5-3 किग्रा0 मात्रा प्रति0 हे0 700 ली0 पानी में घोलकर छिडकाव करें।
मेटालेक्सिल 2.5 ग्राम प्रति किग्रा0 बीज शोधित करनें से सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग की प्रारंभिक अवस्था में रोकथाम हो जाती है।
मेटालेक्सिल 2.5 ग्राम प्रति किग्रा0 बीज शोधित करनें से सफेद गेरूई एवं तुलासिता रोग की प्रारंभिक अवस्था में रोकथाम हो जाती है।
दलहन:
चना/मटर/मसूर-
बथुआ, सेजी, कृष्णनील, हिरनखुरी, गजरी, खरतुआ, आदि इन फसलों के प्रमुख खरपतवार है। खरपतवारनाशी रसायन द्वारा नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरालिन 45 प्रति0 ई0सी0 की 2.2 ली0 मात्रा प्रति हे0 800 ली0 घोलकर बुवाई के तुरन्त पहले मिट्टी में मिला दें अथवा पेंडीमेथालिन 30 प्रति0 ई0सी0 की 3.30 ली0 मात्रा प्रति हे0 उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिडकाव करें।
फली बेधक कीट- इस कीट की सूडिया हरे रंग अथवा भूरे रंग की होती है। प्रारम्भ में कोमल पत्तीयों को खुरचकर खाती हैं। बाद में बडी होने पर फलियों में छेदबनाकर दानो को खाती रहती है। एक सूडी अपने जीवन काल में 30 से 40 फलियों को प्रभावित कर सकती है।
प्रबन्धन- खेत के चारों ओर गेन्दे के पौधे को ट्रैप क्राप के रूप में प्रयोग करना चाहिए। फूल एवं फलिया बनते समय 5 गन्धपास प्रति हे0 की दर से निगरानी के लिए लगाना चाहिए।
चने की अगेती बुवाई (मध्य अक्टूबर) करने से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
एन0पी0वी0 (हे0) 2 प्रति0 ए0एस0 250-300 एल0ई0 प्रति हे0 की दर से लगभग 250-300 लीटर पानी में घोलकर प्रयोग करने से इसका प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है।
2 छोटी अथवा एक बडी सूडी प्रति 10 पौधे मिलने पर इसका रासायनिक नियंत्रण करना चाहिए। इस हेतु एथियन 50 प्रति0ई0सी0 की 1.2 ली0 मात्रा प्रति हेक्टेयर अथवा फ्लूबेंडामाइड 39.35 प्रति0 एस0सी0 की 100 मिली मात्रा प्रति हे0 की दर से 500-600 ली0 पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
तना मक्खी के नियंत्रण हेतु कार्बोफ्यूरान 3 प्रति0 सी0जी0 की 15 किग्रा0 मात्रा प्रति हे0 बुवाई से पूर्व मिट्टी में मिलानी चाहिए अथवा एजाडिरेक्टिन 0.15 प्रति0 ई0सी0 की 2.5 लीटर मात्रा प्रति हे0 की दर से 500-600 ली0 पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
उकठा रोग के नियंत्रण हेतु ट्राईकोडरमा की 2.5 किग्रा0 प्रति है0 की दर से 60-70 किग्रा0 गोबर की खाद में मिलाकर हल्के पानी का छीटा देकर 8-10 दिन छाया में रखने के पश्चात बुवाई से पूर्व आखिरी जुताई के समय खेत में मिलाकर भूमि शोधन करना चाहिए।
बुकनी रोग के नियंत्रण हेतु ट्राईडेमेंफोन 25 प्रति0 डब्लू0पी0 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें या टेबुकोनाजोल 50 प्रति0+ट्राईफ्लोक्सीस्ट्राबिन 25 प्रति0 डब्लू0जी0 की 350 ग्राम मात्रा प्रति हे0 500 ली0 पानी में घोलकर छिड़काव करें। गन्ना पायरिला कीट से बचाव हेतु इसके प्राकृतिक शत्रु एपीरेकेनिया मेलोनोल्युका का फसल वातावरण में संरक्षण किया जाना चाहिए। परजीवी कीट के प्रयाप्त उपस्थिति में कीट की स्वतः रोकथाम हो जाती है। जैविक नियंत्रण हेतु ट्राईकोग्रामा के 50000 अण्डे प्रति0 हैं0 की दर से 10 से 15 दिन के अन्तराल पर प्रयोग करने चाहिए। रायायनिक नियंत्रण हेतु क्लोरोपाईरीफास 20 प्रति ई0सी0 की 1.5 ली0 मात्रा प्रति हे0 की दर से 800-1000 ली0 पानी में घोलकर छिड़काव करें।
गन्ने में लेपिडोप्टेरा कुल के कीटो के रोकथाम के लिए लाइट ट्रैप का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी होता है।
लाल सडन रोग से बचाव हेतु रोग रोधी प्रजातियों का ही चयन करना चाहिए सूडोमोनास फ्लोरिसेन्स की 2.5 किग्रा0 मात्रा प्रति हे0 की दर से 80-100 किग्रा0 गोबर की खाद में मिलाकर आखिरी जुताई के समय खेत में मिलाकर भूमि मे मिला दें।
आलूः- बथुआ, सेजी, कृष्णनील, हिरनखुरी, गजरी, खरतुआ आदि इन फसलों के प्रमुख खरपतवार है। खरपतवारनाशी रसायन द्वारा नियंत्रण हेतु फ्लूक्लोरालिन 45 प्रति0 ई0सी0 की 2.2 ली0 मात्रा प्रति हे0 800 ली0 घोलकर बुवाई के तुरन्त पहले मिटटी में मिला दें अथवा पेंडीमेथालिन 30 प्रति0 ई0सी0 की 3.30 ली0 मात्रा प्रति हे0 उपरोक्तानुसार पानी में घोलकर बुवाई के 2-3 दिन के अन्दर समान रूप से छिडकाव करें।
अगेती झुलसा- आरम्भ में इस रोग के लक्षण निचली एवं पुरानी पत्तियों पर छोटे-छोटे अण्डाकार भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। इसका प्रभाव पत्तियों और कन्द दोनों पर पड़ता हैं। प्रभावित कन्दों में धब्बे के नीचे का गूदा एवं शुष्क हो जाता है।
पछेती झुलसाः-यह आलू की फसल में लगने वाली भंयानक रोग हैं। इसका प्रभाव पौधो की पत्तियों एवं कन्दों पर होता है बदलीयुक्त मौसम 10-20 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान एवं 80 प्रतिशत से अधिक आपेक्षित आर्द्धता की दशा में बीमारी की सम्भावना बढ जाती हैं।
उपरोक्त दोनों रोगों से बचाव हेतु मैन्कोजेब 75 प्रति0 डब्लू0पी0 2 से 2.5 किग्रा0 अथवा काॅपर आक्सीक्लोराइड 50 प्रति0 डब्लू0पी0 2 से 2.5 किग्रा0 मात्रा को 600-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
माहू से बचाव के लिए 4-10 पीले चिपचिपे जाल प्रति एकड लगायें। एन0एस0के0ई0 5 प्रति0 का छिड़काव करें।
राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली (एन0पी0एस0एस0)
राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली (एन0पी0एस0एस0) एक महत्वपूर्ण डिजिटल पहल है, जिसके अंतर्गत कृषि एवं किसान कल्याण विभाग भारत सरकार द्वारा विकसित एन0पी0एस0एस0 ऐप एक एआई आधारित मोबाइल एप्लीकेशन है, जिसका उद्देश्य संभावित कीट पहचान, कीट निगरानी एवं सलाह प्रसार करना है। इस ऐप के माध्यम से किसानों को कीट प्रबंधन से संबंधित सटीक एवं त्वरित सलाह उपलब्ध कराई जाती है, जिसमें किसान अपनी फसलों अथवा कीटों की फोटो खींचकर अपलोड कर सकते हैं, जिसका कृषि विशेषज्ञों द्वारा विश्लेषण कर समाधान प्रदान किया जाता है, जिससे फसल क्षति में कमी आती है, उत्पादकता में वृद्धि होती है तथा कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से भी बचाव संभव होता है। यह प्रणाली किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है, अतः किसानों को सलाह दी जाती है कि वे इस डिजिटल प्रणाली से जुड़कर फसलों में लगने वाले कीटों के नियंत्रण हेतु समय से एवं गुणवत्तापूर्ण समाधान प्राप्त करें। एन0पी0एस0एस0 के क्रियान्वयन के माध्यम से आई0पी0एम0 विद्या का व्यापक प्रचार-प्रसार हो रहा है, जिसके अंतर्गत कृषक इस ऐप को अपने मोबाइल में डाउनलोड कर बोई गई समस्त फसलों में लगने वाले कीट एवं रोग की फोटो खींचकर उनकी सघनता के आधार पर तत्काल निदान प्राप्त कर सकते हैं। यह कीट एवं रोगों की त्वरित रोकथाम का एक प्रभावी एवं उत्तम माध्यम है, जिसे अपनाकर कृषक अपनी फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं। जनपद के समस्त कृषकों से अपील है कि वे अपने मोबाइल में प्ले स्टोर से एन0पी0एस0एस0 ऐप डाउनलोड कर अपनी फसलों की उचित देखभाल सुनिश्चित करें। साथ ही जनपद स्तर पर कृषि रक्षा अधिकारी एवं तकनीकी सहायकों की स्काउट आईडी बनाई गई है, जिसके माध्यम से कीट एवं रोगों की सघन निगरानी की जा रही है तथा कृषकों के बीच गोष्ठियों, समाचार पत्रों एवं किसान पाठशालाओं के माध्यम से एन0पी0एस0एस0 ऐप का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
*सहभागी फसल निगरानी एवं निदान प्रणाली (पी0सी0एस0आर0एस0)*
सूचना प्रौद्योगिकी के महत्व को दृष्टिगत रखते हुए जनहित में कृषकों के कल्याण हेतु कृषि रक्षा अनुभाग (कृषि विभाग) द्वारा एक अनूठी पहल की गई है, जिसके अंतर्गत दो मोबाइल नंबर क्रमशः 9452247111 एवं 9452257111 उपलब्ध कराए गए हैं। इन नंबरों पर कृषक अपनी फसलों में लगने वाले कीट एवं रोग संबंधी समस्याओं को एसएमएस अथवा व्हाट्सएप के माध्यम से भेज सकते हैं। कृषकों को अपनी समस्या के साथ अपना नाम, ग्राम का नाम, विकासखंड का नाम एवं जनपद का नाम भेजना अनिवार्य है, साथ ही प्रभावित फसल की फोटो भी प्रेषित की जा सकती है। प्राप्त शिकायतों का निस्तारण निर्धारित समय सीमा के अंतर्गत अधिकतम 48 घंटे के भीतर कर दिया जाता है तथा समाधान की जानकारी कृषक को उसके मोबाइल नंबर पर एसएमएस के माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है। इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम का व्यापक प्रचार-प्रसार वाल पेंटिंग, पम्फलेट, कृषक गोष्ठियों, समाचार पत्रों आदि विभिन्न माध्यमों से निरंतर कराया जा रहा है।
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