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भरत मिलाप से सीता हरण तक की लीला ने मोहा दर्शकों का मन, जटायु के बलिदान ने किया भावुक।

ग्रेटर नोएडा/ फेस वार्ता श्री धार्मिक रामलीला कमेटी की ओर से आयोजित भव्य रामलीला एवं दशहरा महोत्सव-2026 में शनिवार को सातवें दिन चित्रकूट, राम-भरत मिलाप, पंचवटी लीला, सीता हरण और जटायु वध का भावपूर्ण मंचन किया गया। गोस्वामी सुशील महाराज के दिशा-निर्देशन तथा युवा अध्यक्ष आनंद भाटी के मार्गदर्शन में कलाकारों ने रामायण के इन प्रसंगों को जीवंत कर दिया। लीलाओं को देखकर दर्शक भावविभोर हो उठे और पूरा रामलीला परिसर प्रभु श्रीराम तथा माता सीता के जयकारों से गूंज उठा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जगद्गुरु स्वामी सतीशाचार्य महाराज (प्रेमेश्वर पीठ, महर्षि आश्रम) रहे।
चित्रकूट में हुआ राम-भरत मिलाप
संस्था के अध्यक्ष आनंद भाटी ने बताया कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण चित्रकूट में अपनी कुटिया बनाकर निवास करते हैं। इसी बीच अयोध्या में महाराज दशरथ के निधन का समाचार मिलने पर भरत जी अयोध्या लौटते हैं। जब उन्हें पता चलता है कि प्रभु श्रीराम वनवास में हैं, तो वे पूरी अयोध्या के साथ उन्हें वापस लाने के लिए चित्रकूट पहुंच जाते हैं।
भरत जी प्रभु श्रीराम से अयोध्या लौटकर राजपाट संभालने का आग्रह करते हैं, लेकिन पिता की आज्ञा का पालन करते हुए श्रीराम वनवास पूरा करने के अपने संकल्प पर अडिग रहते हैं। अंततः भरत जी प्रभु श्रीराम की चरण पादुकाएं लेकर अयोध्या लौटते हैं और उन्हीं को सिंहासन पर विराजमान कर उनकी ओर से शासन चलाने का संकल्प लेते हैं।
पंचवटी में शूर्पणखा प्रसंग से शुरू हुआ संघर्ष
चित्रकूट में अयोध्यावासियों के बार-बार आने की संभावना को देखते हुए प्रभु श्रीराम पंचवटी में नई कुटिया बनाकर निवास करने लगते हैं। वनवास के दौरान वे ऋषि-मुनियों को राक्षसों के आतंक से मुक्त कराते हैं और उन्हें भयमुक्त जीवन का आश्वासन देते हैं।
इसी दौरान रावण की बहन शूर्पणखा प्रभु श्रीराम पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव रखती है। श्रीराम के विवाहित होने की बात सुनकर वह लक्ष्मण के पास जाती है। घटनाक्रम के दौरान जब वह माता सीता पर आक्रमण करने का प्रयास करती है, तो लक्ष्मण उसकी नाक-कान काटकर उसे दंडित करते हैं।
अपमान का बदला लेने के लिए शूर्पणखा अपने भाइयों खर-दूषण के पास पहुंचती है। इसके बाद खर-दूषण विशाल सेना के साथ प्रभु श्रीराम से युद्ध करने आते हैं, लेकिन युद्ध में दोनों मारे जाते हैं। इसके बाद शूर्पणखा लंका पहुंचकर रावण को माता सीता के हरण के लिए उकसाती है।
स्वर्ण मृग के मायाजाल में हुआ माता सीता का हरण
शूर्पणखा के अपमान का बदला लेने के लिए रावण अपने मामा मारीच के साथ पंचवटी पहुंचता है। मारीच स्वर्ण मृग का रूप धारण कर माता सीता को आकर्षित करता है। माता सीता के आग्रह पर प्रभु श्रीराम स्वर्ण मृग के पीछे जाते हैं। काफी दूर जाने के बाद जब श्रीराम मारीच पर बाण चलाते हैं, तो वह मायावी आवाज में 'हा लक्ष्मण, हा लक्ष्मण' पुकारता है।
आवाज सुनकर माता सीता लक्ष्मण को प्रभु श्रीराम की सहायता के लिए भेज देती हैं। इसी अवसर का लाभ उठाकर रावण साधु का वेश धारण कर आता है और माता सीता का हरण कर लंका की ओर ले जाता है।
माता सीता की रक्षा में जटायु ने दिया प्राणों का बलिदान
रावण जब माता सीता को लेकर जा रहा होता है, तभी पक्षीराज जटायु उसे रोकने का प्रयास करते हैं। माता सीता की रक्षा के लिए जटायु और रावण के बीच भीषण युद्ध होता है। इस संघर्ष में जटायु गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।
माता सीता की खोज में निकले प्रभु श्रीराम की मुलाकात घायल जटायु से होती है। जटायु उन्हें सीता हरण की पूरी घटना बताते हैं और इसके बाद अपने प्राण त्याग देते हैं। प्रभु श्रीराम जटायु का अंतिम संस्कार कर उन्हें पिता के समान सम्मान प्रदान करते हैं।
प्रभु श्रीराम का चरित्र देता है प्रेम, सम्मान और सद्भाव का संदेश
अध्यक्ष आनंद भाटी ने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन केवल आदर्श मर्यादा का प्रतीक नहीं, बल्कि मानवता, करुणा और सभी जीवों के प्रति सम्मान का संदेश भी देता है। उन्होंने मनुष्य, प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ सद्भाव का संबंध स्थापित किया। जटायु के प्रति उनका व्यवहार इस बात का प्रमाण है कि सच्चा सम्मान किसी के पद या स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके प्रेम, त्याग और समर्पण से जुड़ा होता है।
रामलीला के इन प्रसंगों ने दर्शकों को भावुक करने के साथ-साथ धर्म, कर्तव्य, त्याग और मर्यादा का संदेश भी दिया। कलाकारों के सजीव अभिनय और प्रभावशाली मंचन की दर्शकों ने सराहना की।
आगामी दिनों में होंगे रोमांचक प्रसंग
श्री धार्मिक रामलीला में 18 अक्टूबर को शबरी प्रसंग, राम-हनुमान मिलन, किष्किंधा लीला, बाली वध, अशोक वाटिका, लंका दहन, सेतु निर्माण और रावण-अंगद संवाद का मंचन प्रस्तावित है। वहीं, 19 अक्टूबर को लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध तथा राम-कुंभकरण और राम-रावण युद्ध की लीलाएं दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहेंगी।
11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर 2026 तक प्रतिदिन शाम सात बजे आयोजित हो रहा यह रामलीला एवं दशहरा महोत्सव क्षेत्रवासियों के लिए आस्था, संस्कृति और मनोरंजन का विशेष अवसर बन रहा है। आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, संस्कारों और प्रभु श्रीराम के आदर्शों से जोड़ना है।

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