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रक्षाबंधन बना संवेदना, सम्मान और समावेशिता का प्रेरक पर्व भगवत प्रसाद शर्मा की कलम ✍️ से

गौतमबुद्धनगर/ फेस वार्ता: रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति में प्रेम, विश्वास और आत्मीयता का पर्व है। इस बार ग्रेटर नोएडा कलेक्ट्रेट में यह पर्व अपने पारंपरिक अर्थ से आगे बढ़कर संवेदना, सम्मान, समानता और सामाजिक समावेशिता का प्रेरक संदेश लेकर आया। अवसर था विशेष बच्चों द्वारा अपने हाथों से तैयार की गई राखियां जिलाधिकारी श्रीमती मेधा रूपम जी की कलाई पर बांधने का। यह आत्मीय क्षण उपस्थित लोगों के लिए भावुक और प्रेरणादायी बन गया।
आर्या फैशन्स की संस्थापिका एवं महिला उद्यमी डॉ. खुशबू सिंह जी के साथ अभय किड्स फाउंडेशन के विशेष बच्चों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिलाधिकारी मेधा रूपम जी को स्वयं निर्मित सुंदर राखियां भेंट कीं। इन राखियों में केवल रंग, धागे और सजावटी सामग्री ही नहीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाशीलता, मेहनत, लगन और आत्मविश्वास भी दिखाई दे रहा था।
जब बच्चों ने अपने नन्हे हाथों से जिलाधिकारी जी की कलाई पर राखी बांधी, तो वह क्षण औपचारिकता से ऊपर उठकर प्रशासन और विशेष बच्चों के बीच आत्मीय जुड़ाव का प्रतीक बन गया। जिलाधिकारी श्रीमती मेधा रूपम जी ने बच्चों से सहजता और स्नेह के साथ संवाद किया तथा उनकी रचनात्मक प्रतिभा और मेहनत की सराहना कर उनका उत्साह बढ़ाया।
उनका व्यवहार इस महत्वपूर्ण संदेश को रेखांकित करता है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि अवसर, प्रशिक्षण, सम्मान और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। समाज यदि उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दे, तो वे आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकते हैं।
“जहाँ चाह, वहाँ राह”—यह लोकोक्ति इन बच्चों के प्रयासों पर पूरी तरह चरितार्थ होती है। जिन हाथों को अक्सर उनकी विशेष आवश्यकताओं के कारण सीमाओं में देखा जाता है, उन्हीं हाथों ने अपनी रचनात्मकता से ऐसी राखियां तैयार कीं, जिन्होंने कलेक्ट्रेट के वातावरण को भावनात्मक बना दिया।
हुनर से आत्मनिर्भरता की ओर
आर्या फैशन्स द्वारा अभय किड्स फाउंडेशन के ऑटिज्म, डाउन सिंड्रोम तथा अन्य विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों को हस्तशिल्प प्रशिक्षण देना सराहनीय सामाजिक पहल है। इसका उद्देश्य केवल उन्हें कोई कला सिखाना नहीं, बल्कि उनके भीतर छिपी रचनात्मक क्षमता को पहचानकर सकारात्मक दिशा देना है।
जब बच्चे अपने हाथों से कुछ बनाते हैं और समाज उनकी रचना की प्रशंसा करता है, तो उनके भीतर उपलब्धि और आत्मविश्वास की भावना मजबूत होती है। यही आत्मविश्वास आगे चलकर आत्मनिर्भरता का आधार बनता है।
कवि की प्रसिद्ध पंक्तियां हैं—
“लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।”
इन पंक्तियों की भावना इन बच्चों के प्रयासों में स्पष्ट दिखाई देती है।
डॉ. खुशबू सिंह की पहल इस बात का उदाहरण है कि सामाजिक परिवर्तन बड़े अभियानों के साथ-साथ संवेदनशील और निरंतर छोटे प्रयासों से भी संभव है। विशेष बच्चों के हाथों में हुनर देना वास्तव में उनके हाथों में आत्मनिर्भर भविष्य की संभावनाएं सौंपना है।
अभय किड्स फाउंडेशन की प्रधानाचार्या श्रीमती दिशा कपूर जी ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि विशेष बच्चों के विकास के लिए शैक्षणिक शिक्षा के साथ उनकी रचनात्मक प्रतिभा और व्यावहारिक कौशल को पहचानना तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण देना आवश्यक है।
राखी के धागे में बड़ा संदेश
इस अवसर पर राखी केवल भाई-बहन के रिश्ते का प्रतीक नहीं रही, बल्कि मानवता, समानता, सम्मान और सामाजिक स्वीकार्यता का संदेश बन गई। विशेष बच्चों द्वारा जिलाधिकारी जी की कलाई पर बांधी गई राखी मानो समाज से कह रही थी कि हर बच्चा सम्मान का अधिकारी है और हर बच्चे में कोई न कोई विशेष प्रतिभा अवश्य होती है।
“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।” यदि समाज विशेष बच्चों के मन में विश्वास और आत्मसम्मान जगाए, तो उनके विकास की संभावनाएं कई गुना बढ़ सकती हैं।
इस आयोजन ने यह भी स्पष्ट किया कि विशेष बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ना केवल किसी एक संस्था या व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रशासन, विद्यालयों, सामाजिक संगठनों, उद्योगों और आम नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।
आयोजन की सबसे सुंदर तस्वीर बच्चों के चेहरों पर खिली मुस्कान रही। अपनी बनाई राखी जिलाधिकारी जी को पहनाना और उनसे स्नेह तथा प्रशंसा पाना उनके लिए निश्चित रूप से यादगार अनुभव रहा।
रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर बंधा यह धागा केवल एक कलाई पर नहीं बंधा; उसने दिलों को जोड़ा, संवेदनाओं को जगाया और समाज को समावेशिता का संदेश दिया।
“उड़ान पंखों से नहीं, हौसलों से होती है।”इन विशेष बच्चों ने अपने हुनर से साबित कर दिया कि प्रतिभा किसी सीमा की मोहताज नहीं होती। आवश्यकता है तो केवल उसे पहचानने वाली नजर, प्रोत्साहित करने वाला समाज और आगे बढ़ाने वाला हाथ। 

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